भारत में वित्तीय समावेशन की कहानी 28 अगस्त को एक अहम पड़ाव पर पहुंच रही है। प्रधानमंत्री जन-धन योजना अपने 12 गौरवशाली वर्ष पूरे कर रही है और इस अवधि में यह पहल करोड़ों परिवारों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ते हुए सामाजिक-आर्थिक बदलाव का मजबूत आधार बन चुकी है।
योजना के तहत देशभर में अब तक 58 करोड़ से अधिक जन-धन खाते खोले जा चुके हैं। इनमें करीब 32.72 करोड़ खाते महिलाओं के नाम पर हैं। यह उपलब्धि वित्तीय समावेशन के साथ-साथ महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में भी बड़ा संकेत देती है।
प्रत्यक्ष लाभ अंतरण यानी DBT ने इस बदलाव को और प्रभावी बनाया है। सरकारी योजनाओं के लाभ अब सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में पहुंच रहे हैं। इससे बिचौलियों की भूमिका घटी, पारदर्शिता बढ़ी और सब्सिडी तथा सरकारी लाभों के वितरण में अनियमितताओं पर अंकुश लगा।
जन-धन योजना का प्रभाव केवल खातों की संख्या तक सीमित नहीं है। इससे आम नागरिक के आत्मविश्वास, आर्थिक स्वतंत्रता और गरिमा को भी नई मजबूती मिली है। जो लोग कभी बैंकिंग व्यवस्था से बाहर थे, वे आज औपचारिक अर्थव्यवस्था के सक्रिय भागीदार बन रहे हैं।














































