नई दिल्ली, 03 सितंबर 2026: G20 देशों के यात्री अगर कारपूलिंग, बसों का अधिक उपयोग और सप्ताह के कुछ दिन घर से काम करने जैसे बदलाव अपनाएं, तो 2050 तक यात्री परिवहन से होने वाला सालाना CO₂ उत्सर्जन 408-538 मिलियन टन तक घट सकता है। CEEW के नए स्वतंत्र अध्ययन के अनुसार, यह कटौती 2024 में दक्षिण अफ्रीका के पूरे साल के कार्बन उत्सर्जन के लगभग बराबर है।
काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर यानी CEEW की रिपोर्ट “A Global Mission LiFE: Mitigation Potential of Behavioural Changes in Passenger Transport in G20 Countries” भारत के Mission LiFE दृष्टिकोण पर आधारित है, जिसे COP26 में सततशील और कम-कार्बन आदतों को रोजमर्रा के फैसलों से जोड़ने के उद्देश्य से सामने रखा गया था।
अध्ययन बताता है कि इन व्यवहारिक बदलावों का असर हर क्षेत्र में समान नहीं होगा। विकसित देशों और चीन में कार स्वामित्व अधिक है और औसत यात्रा दूरी लंबी है, इसलिए कुल उत्सर्जन बचत का **80-88 प्रतिशत** हिस्सा इन्हीं अर्थव्यवस्थाओं से आ सकता है। अकेले अमेरिका और EU-15 का योगदान 61-63 प्रतिशत तक रह सकता है। प्रति व्यक्ति आधार पर भी अंतर बड़ा है—एक औसत अमेरिकी की संभावित उत्सर्जन बचत एक भारतीय की तुलना में 56 गुना तक अधिक हो सकती है।
CEEW के सीनियर फेलो डॉ. वैभव चतुर्वेदी के अनुसार, Mission LiFE जलवायु कार्रवाई को उत्पादन से आगे ले जाकर जिम्मेदारीपूर्ण उपभोग से जोड़ता है। अध्ययन इसी विचार को वैश्विक साक्ष्य देता है और दिखाता है कि जहां परिवहन व्यवस्था कारों पर अधिक निर्भर है, वहां व्यवहार परिवर्तन से सबसे बड़ी जलवायु बचत संभव है।
ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर भी यह बदलाव अहम संकेत देता है। 2025 से 2050 के बीच यात्री परिवहन में लगभग 2,715 मिलियन टन तेल की खपत घट सकती है। यह 2024 की वैश्विक तेल मांग के करीब 59 प्रतिशत के बराबर है। अप्रैल 2026 की तेल कीमतों के आधार पर इसकी कुल कीमत लगभग 2.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर आंकी गई है। 2050 तक सालाना तेल खर्च में करीब 90 बिलियन अमेरिकी डॉलर की बचत भी संभव है।
सबसे प्रभावी उपाय के रूप में कारपूलिंग सामने आती है। अकेले यह कदम सालाना 236-411 मिलियन टन CO₂ उत्सर्जन कम कर सकता है और 2050 में G20 यात्री परिवहन उत्सर्जन में 20 प्रतिशत तक कटौती ला सकता है। हालांकि, इससे मिलने वाली बचत का 92 प्रतिशत तक हिस्सा विकसित देशों और चीन में केंद्रित रहने की संभावना है।
CEEW की प्रोग्राम एसोसिएट रोहिणी दीक्षित के अनुसार, उत्सर्जन बचत का भौगोलिक वितरण महत्वपूर्ण है। विकसित देशों और चीन में कार-आधारित आवागमन अधिक होने से कटौती की क्षमता ज्यादा है, जबकि भारत की प्रति व्यक्ति उत्सर्जन बचत संभावना कम है। भारत और अन्य विकासशील देशों के लिए यह अवसर है कि भविष्य की परिवहन प्रणाली निजी वाहनों पर अत्यधिक निर्भर न बने।
CEEW ने G20 देशों को सुझाव दिया है कि व्यवहार परिवर्तन से होने वाली उत्सर्जन कटौती को जलवायु नीति में मापने योग्य बनाया जाए और राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं में इसे सत्यापित करने के साझा तरीके शामिल किए जाएं। विकसित देशों और चीन के लिए कारपूलिंग प्लेटफॉर्म, हाइब्रिड वर्क मानक, भीड़भाड़ और पार्किंग शुल्क जैसे कदम तेज करने की सिफारिश की गई है। विकासशील देशों के लिए बस बेड़ों के विस्तार, इलेक्ट्रिफिकेशन और साझा परिवहन को प्राथमिकता देने की बात कही गई है।
अध्ययन में Global Change Analysis Model, GCAM V8.2 का उपयोग किया गया है। इसमें हाइब्रिड वर्क को कम आवागमन, कारपूलिंग को प्रति वाहन अधिक सवारियों और बसों के उपयोग को यात्रियों की पसंद में बदलाव के रूप में मॉडल किया गया है। यह अध्ययन उन G20 देशों पर केंद्रित है, जिनकी वैश्विक GDP में 84 प्रतिशत और वैश्विक CO₂ उत्सर्जन में 78 प्रतिशत हिस्सेदारी है।














































