कोई कुछ भी कर लो पर आयेंगे तो वो ही, उनकी काट किसी के पास नही

नई दिल्ली: पूरे कॉर्पोरेट जगत में ऑयल और गैस की एक जानी मानी, या यूँ कहें कि पहले भारत , फिर……स्लोगन के नाम से मशहूर कंपनी के सर्वोत्तम पद को लेकर इस बात की चर्चाएँ हैं कि “आयेंगे तो वो ही” पर कैसे आयेंगे? ये बड़ा सवाल सभी के मन में विचलन पैदा कर रहा है।

पाठक समझ गए होंगे कि हम किस और इशारा कर रहे हैं, ज़ी हाँ, वही जो पूरे भारत में अकेले हैं जिनके बारे में अब कहा जाने लगा है कि चिराग़, बल्कि गैस की लालटेन लेकर ढूँढ़ने के बाद बड़ी मुश्किल से मिले थे, अब उन्हें इतनी आसानी से कैसे छोड़ दिया जाए।

ये एक पुरानी कहावत है कि माँ को पूरी क्लास में अपने एक आँख वाला बच्चा ही सबसे प्यारा लगा था, ये अलग बात है कि उस पद को भरने के लिए कई ऐसे प्रतिभाशाली भी लाइन में थे जिन में प्रतिभा तो थी पर सिफ़ारिश नहीं थी।

अगर हम देश की इकॉनमी पर नज़र डालें तो सबसे ज़्यादा राजस्व तेल और गैस सेक्टर की कंपनी से ही आता है, इसके अलावा मंत्रीगण तो यहाँ तक बोल चुके हैं कि CSR में इन कंपनियों का एक बड़ा योगदान रहता है।

अभी हाल ही में ऑयल और गैस सेक्टर की PSUs पर SEBI द्वारा लगाई पेनल्टी का समाचार भी चर्चाओं में हैं , ये पेनल्टी इस सेक्टर की कंपनियों में सही समय पर निदेशकों की नियुक्ति ना होने पर डाली गई है।

अब ये सोचने वाली बात है कि जब एक बड़ी PSU के चेयरमैन के पद की नियुक्ति भी सही समय पर नहीं हो पा रही है तो फिर निदेशक की तो दूर की बात है, इस तरह के प्रकरणों से ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे सब कुछ पहले से फिक्स है।

इस PSU के पिछले चेयरमैन का कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद उन को ही अतिरिक्त चार्ज दे दिया गया था, अब अतिरिक्त चार्ज भी अपनी चरम सीमा पर पहुँचने वाला है, पर इस पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया पर दूर दूर तक कोई किर्यान्वबन दिख नहीं रहा है। हाँ ये चर्चाएँ ज़रूर हैं कि कुछ तो हो रहा है, क्या हो रहा है इस विषय में संबंधित मंत्रालय क अफ़सर भी कुछ ज़्यादा ही ख़ामोश हैं।

सरकार के विषय में तो ये प्रचलन है कि “फ़लाँ हैं तो मुमकिन है” तो फिर अब क्या इस पद के बारे में भी ये यही मान लिया जाये कि “–है तो मुमकिन हैं”

एक जमाना था कि जब PSUs को इंडिपेंडेंट रखने पर चर्चायें हुआ करती थीं पर अब वो बात—।

पूरे मुल्क में लोकसभा के चुनाव का बिगुल अनाधिकारिक तौर पर बज चुका है, जिसकी आधिकारिक घोषणा कभी भी हो सकती है, और पाठक ये अच्छी तरह से समझते हैं कि जब चुनाव की धोषणा हो जाती है तो किसी भी प्रकार की नियुक्ति या नए सरकारी काम काज नहीं किए जा सकते।

इसी को लेकर चंद सवाल सबके ज़हन में घूम रहे हैं।

1. एक बड़ी तेल और गैस के चेयरमैन पद पर सर्च कमेटी द्वारा नियुक्ति के संबंध में माप दंड क्या होंगे?
2. क्या इस विषय में सर्च कमेटी की कोई मीटिंग हुई है?
3. आख़िर कब तक अभ्यर्थियों को ये पता चल पायेगा कि वो इस पद के आवेदन के लिए पात्र हैं या नहीं।
4. क्या 60 साल की जगह आयु सीमा का दायरा वसीह करने के प्रयास किए जा रहे हैं?
5. क्या सर्च कमेटी में 61 साल से ज़्यादा आयु वाली लिमिट पर फूट पड़ गई है?
6. चुनाव सर पर हैं बहुत मुमकिन है कि कुछ दिनों में ही आचार संहिता लग जाये। अगर ऐसा होता है तो फिर क्या इस पद के चयन के लिए नई सरकार गठित होने का इंतज़ार किया जाएगा?
7. अचार संहिता लगने के बाद क्या स्टेटस को बरकरार रखा जाएगा?

कुछ जानकारों का कहना है कि कुछ लोग मुँह में चाँदी का चम्मच ले कर पैदा होते हैं, जो एक बार कुर्सी से चिपक जायें तो फिर फेविकोल के जोड़ से भी ज़्यादा मज़बूत उनका जोड़ हो जाता है।

लेकिन NewsIP के एक बड़े सरकारी सूत्र ने कहा, डिप्लोमेसी बहुत काम की चीज होती है, जब उनसे कहा गया थोड़ा इस पर रोशनी डाल कर हमारे पाठकों के इल्म में इज़ाफ़ा करें, तब आपने फ़रमाया, इस पूरे प्रकरण में कुछ चीजें नीचे वालों को पसंद नहीं और कुछ चीजें ऊपर वालों को पसंद नहीं, पर काम दोनों की रज़ामंदी से ही होगा, इसलिए वक़्त का इंतज़ार करना और कराना ही इस पद की नियुक्ति के लिए बेहतर होगा, क्योंकि वक्त तो बदलता है अब चुनाव के बाद वक़्त कौन सी करवट बदले कुछ नही  पता।

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