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जनता की एक बहुमूल्य धरोहर को सिर्फ़ कौड़ियों के मोल बाँट रही मोदी सरकार -कांग्रेस

नई दिल्ली: रेलवे निजीकरण करके मोदी सरकार भारत की सबसे बड़ी संस्थान का निजीकरण कर भारत की जनता की एक बहुमूल्य धरोहर को ना सिर्फ़ कौड़ियों के मोल बाँट रही है इस समय और इस वातावरण में देश के लिए यह कदम एक बड़ी हार और बर्बादी का मामला होगा। इस समय इस प्रकार से इस वातावरण में किया गया निजीकरण भारत के हर हित के विरुद्ध है, प्राइवेट एंटरप्राइज को फायदा पहुंचाता है और बिलकुल गलत है और घोर अन्याय है।[espro-slider id=3943]

रेलवे विश्व का, एशिया का सबसे बड़ा दूसरे नंबर पर रोजगार देने वाला सिंगल मैनेजेमेन्ट का लार्जेस्ट नेटवर्क है यह रेलवेज। लगभग ढाई करोड़ लोगों को प्रतिदिन ये आवागमन करवाता है। 7.2 से 7.5 बिलियन पैसेंजर्स तोसाढ़े 7 हजार करोड़ पैसेंजर्स वार्षिक है। एक ऑस्ट्रेलिया की आबादी दिन-प्रतिदिन स्थानांतरण करती है भारतीय रेलवे में और डेढ़ करोड़ लोग उसकी लगभग रोजगार परनुमाईंदे हैं, मुलाजिम हैं। विश्व में आप कोई भी एक्टिविटी लें, सिर्फ रेलवे की बात नहीं, विश्व में रोजगार देने वाली कोई भी एक्टिविटी ले, उसमें भारतीय रेलवे सातवें नंबरपर रोजगार देती है।  समझ नहीं आता है कि किस प्रकार की राजनीतिक जिद्द चल रही है। मैं तीन-चार संक्षिप्त प्रश्न पूछ कर आपकोअपनी बात अंडरलाइन करना चाहता हूं।

नंबर एक, आपने माननीय मंत्री महोदय 17 मार्च को संसद में बड़ा स्पष्ट कहा था। इस विषय में दो दिन उसमें बहस हुई थी कि आप निजीकरण नहीं करेंगे। हम ये भी जानतेहैं कि आप इसे निजीकरण नहीं बोलते। आप कहते हैं ये तो रेलवे का निजीकरण नहीं है, प्राइवेटाइजेशन कुछ लाइन्स का है। इन शब्दों के जाल में कृपा देश को मूर्ख मतबनाईए। क्या आप कॉमन सेंस, आम दिमाग लगाने वाली शक्ति के आधार पर कह सकते हैं कि काम करने का, कोरोना वायरस के इतनी भंयकर त्रास्दी के दौरान, संक्रमणके दौरान ये सबसे अच्छा समय है ये काम करने का ? क्या देश को रेलवे की एक लाइन भी प्राइवेटाइज करने से सबसे ज्यादा फायदा इस समय होगा?

निजीकरण का मतलब क्या होता है कि देश के हित में सबसे ज्यादा आप उसके सौजन्य का एक्सप्लोइटेशन निकालें, जिससे देश को तुरंत फायदा हो। क्या इस वक्तबिड्स, मांगे, दावे, रुपए, पैमेंट न्यूनतम भी होंगे ? मध्यम भी छोड़िए, सबसे ऊपर होंगे? तो ऐसे वातावरण में जब आपकी फ्रेट इसी 17 मार्च की डिबेट में नोट किया गया, 4 प्रतिशत से 1 प्रतिशत हो गया। जब आपकी गिरावट हो रही है रिवेन्यू में, ऊपर से आकर बैठा है कोरोना वायरस। आप इस वक्त इतने बडे डेफिसिट पर उस डिबेट में कहागया है कि 25 हजार करोड़ औसतन, 25 हजार करोड़ औसतन, करंट अकाउंट रिवेन्यू डेफिसिट है। कैपिटल और इनवेस्टमेंट की बात नहीं कर रहा , तो किस औचित्य सेआप ये कर रहे हैं? क्या सस्ता फैंकना है, क्या उड़ाना है, क्या उपलब्धि सबसे अच्छी नहीं इस बीच की करनी है? न्यूनतम करनी है, आपका ये क्या इरादा है?

तीसरा, आपने इसी प्रकार की अजीबों-गरीब नीति देश भर में अपनाई। अभी आपने कोल माईनिंग के लिए ऐसा समय चुना कि ठीक कोरोना के बीच नोन कैपिटव  में भीकोल माईनिंग निजीकरण हो सकता है। इस वक्त किसमें दम है, आर्थिक स्तंभ है, मजबूती है, धनाढ्य है, शक्तिशाली है, जो अच्छी रेट दे सकता है? हमें इस विस्यमकारीका उत्तर किसी रुप से, परोक्ष रुप से नहीं बताया।

चौथा, क्या आप थोड़ा नहीं रुक सकते थे कि संसद में इसके बारे में बातचीत करके करते? संसद आप बुलाते नहीं हैं, संसद का वर्चुअल सैशन नहीं करते हैं? अधिकतर समितियों को वर्चुअली मिलने नहीं देते हैं, लेकिन इसके ऊपर संसद में कम से कम विचार-विमर्श तो कर लेते। हम तो कहते हैं कि कानून पास करवा लेते। लेकिन कानूनपास करने का आपका इरादा नहीं है, कम से कम विचार-विमर्श के बाद एक रेजोल्यूशन तो करवा लेते। संसद के विषय में ये पतली गली से निकल कर भाग जाना संसद केविषय में, जवाबदेही अवोयड करना, इतने बड़े सैंकड़ो- करोड़ के इतने बड़े सौजन्य और शान भारत के विषय में आप किस नीति से, किस उद्देश्य से, किस औचित्य से कररहे हैं, हमें समझ नहीं आ रहा है। ये जबरदस्त जल्दी क्यों है?

तीन स्टेक होल्डर्स होते हैं। एक होता है- यात्री, एक होता है- सामान भेजने वाला, वो भी बहुत बड़ी मात्रा है, तीसरा होता है- रोजगार, जो इनके मुलाजिम हैं। कोरोना के ठीकबीच बिना विचार-विमर्श किए, बिना संसदीय रेजोल्यूशन तीनों के पैर पर आप एकसाथ लात मार रहे हैं। क्या आपका अगला कदम रिट्रेचमेंट, छँटाई होगा? अलग-अलगनाम देकर, कभी लुकेछुपे, कभी परोक्ष रुप से ये नाम देकर, वो नाम देकर और उसी लाइन पर जो चलेगी। वो कैसे एक लाइन, वही लाइन नुकसान कर रही है, दूसरी लाइनजो चलाएगा प्राईवेट। फायदा कैसे करेगा, पैसा कहाँ से लाएगा, पैसा कैसे लगाएगा, जब उस लाइन में आपकी खुद की ट्रेन इतने नुकसान पर चल रही है। देश इन सबप्रश्नों की जवाबदेही मांगता है और जवाबदेही के सामने उसको चुप्पी मिल रही है।

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