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अमित शाह के सामने बतौर वज़ीर पेश आने वाली दुशवारियाँ

(दीपक कुमार त्यागी, स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार)  हिंदुस्तान की अवाम ने 2019 के लोकसभा इंतख़ाब में वज़ीरे आज़म मोदी की क़यादत में  303 सीटों पर जीत दर्ज करा कर  भाजपा को हुकूमत  बनाने के लिए ज़बरदस्त इख़्तेदार दिया है। इस लोकसभा चुनावों में अवाम का प्यार हासिल करके जीतने का श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बाद अगर किसी को जाता है तो वो है पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह। जिनकी कुशल, कारगर रणनीति के चलते देश के राजनैतिक लोगों के बीच उनको “चाणक्य” की उपाधि से नवाजा जाता है।
दृढ़ इच्छा शक्ति वाले अमित शाह की देश के राजनीतिक गलियारे में पहचान एक बहुत मेहनती और असंभव को संभव बनाने वाले व्यक्ति की हमेशा रही है। जिस तरह से 30 मई को नम्बर-3 पर आकर अमित शाह ने मोदी सरकार में केबिनेट मंत्री के रूप में राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में शपथ ली थी तब से राजनैतिक गलियारों में अटकलों का बाजार बहुत गर्म था कि भाजपा के चाणक्य को मंत्रीमंडल में क्या जिम्मेदारी मिलेगी उनकी सरकार में क्या हैसियत होगी इस पर लोगों ने तरह-तरह के कयास लगाने शुरू कर दिये थे हालांकि उन्हें वित्त मंत्रालय का प्रभार सौंपे जाने की चर्चा बहुत जोरशोर से थी। लेकिन जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 31 मई को विभागों का बट़वारा करके अमित शाह को गृहमंत्री का जिम्मा दिया है उससे अब स्पष्ट हो गया है कि वो सरकार में नम्बर-2 कि हैसियत के साथ सबसे ताकतवर मंत्री के रूप में काम करेंगे और मोदी सरकार के महत्वपूर्ण उद्देश्यों को पूर्ण करेंगे। वैसे प्रधानमंत्री मोदी के सबसे ताकतवर मंत्री अमित शाह के सामने गृहमंत्री के रूप में बहुत सारी चुनौतियां होंगी। जिनका उनको अपनी छवि के अनुसार स्थाई समाधान करना होगा।

भाजपा के चाणक्य व नरेन्द्र मोदी के खासमखास पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के गृहमंत्री बनते देश के बुद्धिजीवियों ने इसके मायनों को लेकर मंथन करना शुरू कर दिया है। राजनीति की समझ रखने वाले लोगों ने आकलन करना शुरू कर दिया है मोदी सरकार की प्राथमिकताओं में अबकी बार गृहमंत्रालय की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी मोदी-शाह की कार्यशैली को देखकर ऐसा लगता है कि सरकार ने देश के बहुत सारे विवादास्पद मसलों का स्थाई समाधान करने के उद्देश्य से अमित शाह को संगठन से लाकर सरकार में नम्बर-2 की हैसियत प्रदान की है। सरकार में विभागों का वितरण हुए अभी कुछ घंटे ही व्यतीत हुए है और लोगों में अमित शाह के महत्वपूर्ण लक्ष्यों व चुनौतियों को लेकर आकलन व अटकलों का जबरदस्त दौर शुरू हो गया है। अब देखने वाली बात यह है कि मोदी सरकार ने जिस तरह से अपने चुनाव प्रचार के दौरान देश के बहुत सारे ज्वंलत मसलों को लेकर जो बाते आम-जनमानस से कहीं थी अब उन पर अमित शाह का गृहमंत्री के रूप में क्या रूख रहेगा। जहां एक तरफ शाह के ऊपर देश की आतंरिक सुरक्षा, देश की सीमाओं की सुरक्षा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होगी वहीं दूसरी तरफ देश के पूर्वी, उत्तरी और दक्षिणी भागों में जो अलग-अलग तरह की ज्वंलत समस्याएं हैं उनसे अमित शाह को अपनी शैली के अनुसार ठोस कारगर रणनीति बना कर निपटना होगा। शाह के सामने पूर्वोत्तर में अवैध घुसपैठ रोकने, कश्मीर में आतंकवाद और दक्षिण भारत के कुछ प्रदेशों में आतंकवादी गुटों के प्रसार पर काबू पाने की बड़ी चुनौती होगी। वहीं एनआरसी और नक्सलवाद जैसी चुनौतियों से शाह कैसे निपटते हैं इस पर सभी की देशवासियों की नजरें रहेंगी। गृहमंत्री के रूप में शाह के सामने जो बड़ी चुनौतियां होंगी उनसे संम्बन्धित कुछ मसलों पर नज़र डालते है।

*धारा-370 एवं आर्टिकल 35-ए* :- इनमें सबसे बड़ा मसला है जम्मू-कश्मीर में धारा-370 और आर्टिकल 35-ए हटाने पर गृहमंत्री अमित शाह का रुख देखने लायक होगा। क्योंकि भाजपा ने अपने एजेंडे में आर्टिकल 35-ए को खत्म करने और धारा-370 पर अपने पुराने रुख पर कायम होने की बात लगातार कही है। शाह भी पार्टी अध्यक्ष के रूप में हमेशा धारा-370 और आर्टिकल 35-ए को हटाने के पक्ष में रहे हैं अब लोगों की निगाहें इस बात पर होंगी कि बतौर गृह मंत्री अमित शाह इस बेहद ज्वंलत मसले पर क्या रुख अपनाते हैं, क्योंकि वे लगातार इसको हटाने की वकालत करते रहे हैं। इन दोनों मसलों पर शाह का रुख कश्मीर की राजनीति को नया आयाम देगा। क्योंकि जम्मू-कश्मीर की सियासी पार्टियां नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी एवं अन्य सभी अलगाववादी गुट धारा-370 के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ होने पर बड़ा आंदोलन करने की धमकी देते आए हैं। वहीं आर्टिकल 35-ए का मसला देश की सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन है। ऐसे में इन संवेदनशील मुद्दों पर शाह का रुख बहुत अहम होगा। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह भी है अगर सब कुछ ठीक रहा तो जम्मू-कश्मीर में इसी साल विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में उससे पहले राज्य में धारा-370 और आर्टिकल 35-ए पर अमित शाह का रुख राज्य की सियासत में काफी उतार-चढ़ाव लाने वाला साबित हो सकता है। आपको बता दें कि हाल के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जम्मू-कश्मीर में तीन सीटों पर जीत दर्ज की है। विधानसभा चुनावों के मद्देनजर भाजपा जम्मू-कश्मीर राज्य में लगातार दिन-प्रतिदिन मेहनत करके अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर रही है। अब देखना है कि राज्य के चुनावों व अपने पुराने रूख पर वो कैसे सामंजस्य बनाकर काम करते है।


*एनआरसी का मसला* :- अमित शाह के सामने गृहमंत्री के रूप में दूसरी बड़ी चुनौती “नेशनल रिजस्टर ऑफ सिटिजनशिप” (एनआरसी) को लागू करवाने में आ सकती है। क्योंकि असम सहित पूर्वोत्तर के कई राज्यों में इसका जमकर विरोध हो रहा हैं। हालांकि पिछली सरकार में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बार-बार लोगों को कहा कि इसे लागू करने में किसी भी नागरिक के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एनआरसी का विरोध करने में मुखर रही हैं। इस मसले पर अमित शाह यदि आगे बढ़ते हैं तो ममता सरकार के साथ उनका टकराव और बढ़ सकता है। हालांकि अमित शाह अपने चुनाव प्रचार के दौरान कहते थे कि एनआरसी को वो सख्ती से लागू करेंगे और देश में अवैध रूप से निवास कर रहे बांग्लादेशी घुसपैठियों को देश से निकाल बाहर करेंगे अब देखते है वो इस चुनौती का सामना कैसे करते है।*राज्यों के साथ संबंध* :- अमित शाह भाजपा अध्यक्ष के रूप में जिस तरह से अलग-अलग राज्यों में पार्टी की सरकार बनाने की विस्तारवादी नीति के लिए प्रसिद्ध रहे है अब गृहमंत्री बनने के बाद देखना होगा कि वो राज्यों के साथ किस तरह मधुर संबंध बनाकर रखते है विशेषकर कांग्रेस शासित राज्यों और पश्चिम बंगाल के साथ। वैसे भी अब सभी की निगाहें पश्चिम बंगाल की सियासी स्थिति पर होंगी क्योंकि शाह के साथ ममता बनर्जी और उनकी पार्टी टीएमसी के तल्ख रिश्ते जगजाहिर है। इन तनावपूर्ण रिश्तों के बीच देखना दिलचस्प होगा कि बतौर गृहमंत्री अमित शाह और ममता दीदी के बीच कानून व्यवस्था और अन्य मामलों पर कैसा संबंध रहता है। यहाँ आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल में लगातार टीएमसी-भाजपा के कार्यकर्ता आमने-सामने हैं। आयेदिन राजनीतिक हिंसा की खबरें आती रही हैं। खुद अमित शाह के खिलाफ बंगाल में मामला दर्ज है।

*देश में नक्सलवाद की समस्या पर अंकुश लगाना* :- अमित शाह के सामने गृहमंत्री के रूप में एक बहुत बड़ी चुनौती होगा देश में नक्सलवाद की समस्या का स्थाई समाधान करना होगा। क्योंकि आज देश के छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र सहित कई राज्य अभी भी नक्सल समस्या से गम्भीर रूप से ग्रसित हैं। अभी हाल में ही महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में नक्सलियों ने कायराना हमला करके 15 जवानों को शहीद कर दिया था। देश के विकास के लिए नक्सल समस्या बार-बार नासूर बनती है। इसे दूर करने के लिए शाह को अपनी छवि के अनुसार गंभीर कारगर प्रयास करने होंगे।

*आतंकवाद की चुनौती* :- मोदी व शाह ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह कहा है कि आतंकवाद के खिलाफ उनकी व उनकी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति हमेशा रहेगी उसके चलते देशवासियों को गृहमंत्री के रूप में शाह से बहुत ज्यादा उम्मीदें है। जम्मू-कश्मीर में जारी आतंकवाद पर काबू पाना अमित शाह के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। क्योंकि शाह आतंक और आतंकवाद के प्रति कड़ा रुख रखने के लिए जाने जाते हैं। हाल के दिनों में जिस तरह से आतंकवादी घटनाओं के तार दक्षिण भारत के केरल एवं तमिलनाडु से जुड़ते दिखे हैं। अमित शाह के सामने इस नई मुसीबत से भी निपटना की चुनौती होगी

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